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दुर्भोग से परे एक सुमिलन

Posted On: 2 Sep, 2017 Hindi Sahitya में

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ये मेरी प्रशंसित कहानियों से एक है। आपको ये कैसी लगी कमेंट्स जरिये मुझे बताएं। इसके प्रकाशित होने के बाद कई लोगों ने मुझसे संपर्क किया और बताया कि ये कहानी वास्तव में एक अद्भुत रचना है। मेरे अन्य ब्लॉग्स को पढऩे के लिए इस लिंक पर आए
दुर्भोग से परे एक सुमिलन
हव्य वाहन की राजनर्तकी मोहिनी कक्ष के भीतर एकांत में थी तभी राजकवि कलाधिक्य ने प्रवेश किया।  मोहिनी तुरंत खड़ी हो गई। कक्ष में सुगंधित वायु चल रही थी। मोहिनी के केश खुले हुए थे जिनमें गुंथा गजरा टूटा हुआ केशों में फंसा था। मोहिनी के पायल की झंकार समस्त कक्ष के मौन को भंग कर रही थी। मोहिनी के गुलाबी वस्त्र में  गौरवर्ण लिए विद्युत की भांति चमक रही थी। माथे पर चंदन और रक्तचंदन का तिलक, ओष्ठ सहज गुलाबी, नेत्र विशाल और मुख पर आश्चर्य। क्या बात है आर्यकुमार आप दासी के कक्ष में..मोहिनी के सम्मोहन से कलाधिक्य वशीकृत हो चुका था। स्वयं को सम्हालकर वो बोला- मोहिनी मैंने तुम्हारा नृत्य देखा, मृदंग की थाप पर तुम्हारे नुपुरों की झंकार और एक सुंदर समन्वय तुम्हारे अंगों का और उनके संचालन का। तुम्हारे रसोत्तम कंठ का जिससे तुम मेरे और स्वयं द्वारा रचित गीत गाती हो। तुम तो साक्षात कला की देवी की तरह हो…मैं तुम्हारी स्तुत्य में तुम्हारे चरणों को ससम्मान ओष्ठों से लगाकर चुंबन लेना चाहता हूं। मोहिनी के चरणों के पायल उनके मनोभावों में बने संकोच के कारण छनक उठी…..आर्यकुमार मैं दासी हूं। मुझे कला की देवी बनाकर आपने मेरे अंदर की कला को सम्मान दिया है। मैं आश्चर्य में हूं। मैं राजा की भोग्या की तरह हूं…मेरे नृत्यकौशल और अंगसंचालन को सदैव सभी द्वारा भोग की दृष्टि से देखा गया उसमें कला केवल आपको ही दृश्यमान हुई। अह्रश्वसराओं की कला देवताओं के द्वारा भोग्य हुई। एक भोग्या होकर मैं कला के रूप में स्तुत्य कैसे हो सकती हूं। आर्यकुमार आप कला के उदधि की भांति हैं मैं आपको चरण चुंबन का अधिकार कैसे दे सकती हूं? मैं आपको हृदय में स्थान देती हूं, अपितु मैं आपके प्रति कृतज्ञ हूं। आप मुझ क्षुद्र नलिका को स्वयं में स्थान देकर धन्य करें…..नलिका नहीं कला की देवी हे कला की गांगेय मैं तुम्हें क्या सम्मान दूं, तुम साक्षात सरस्वती के द्वारा सम्मानित हो। गंगा भी तो पापों का शमन करती है। पापों को स्वयं में स्थान देकर मानव को पाप मुक्त करती है। आर्यकुमार मुझे स्वयं में स्थान दीजिए ऐसा सम्मान मुझे जन्म से आज तक नहीं मिला। कलाधिक्य और मोहिनी आलिंगन बद्घ हो गए। बहुत देर तक जब कलाधिक्य कक्ष के बाहर नहीं आया तो द्वारपाल को संदेह हुआ वो अंदर गया तो एक मादक सुगंध से उन्मत्त हो गया। उसने देखा कि शैया पर स्र्वगतुल्य फूलों के ढेर पर नुपुर रखे हुए थे। पवन में गीत और कविताओं सहित नुपुरों की आवाज की सरसराहट है। वो घबरा गया। राजा हव्यवाहन को बुलाया गया। उसने ये देखा राजपुरोहित ने भी ये देखा तो वो बोले कि दो महान कला की आत्माओं का ये दिव्य मिलन है। इन्हें यूं ही रहने दो राजा को क्रोध आ गया। इसे जला दो…कई प्रयासों के बाद भी शैया जल न सकी। इसे नदी में बहा दो….शैया नदी में तैरने लगी। इसे हाथी से कुचलवा दो…हाथी शैया के पास जाकर नृत्य करने लगा और पुष्पों की माला अपने गले से निकालकर शैया पर डाल दी। शैया को पहाड़ से फेंक दो….राजपुरोहित ने समझाया कि ऐसा मत करो। राजा न माना शैया को पहाड़ से फेंका तो नीचे गिरने के बाद भी नष्ट नहीं हुई। राजा अंत में हारकर उसके पास गया और कला की वासना पर विजय की बात कही। तत्काल शैया में से तेज प्रकाश निकला और वो अंतर्धान हो गई। राजा ने अपनी सभी नृत्यांगनाओं को मुक्त कर दिया और सभी को ज्ञान दिया कि कला को भोग की आंच में मत भस्म करो…ऐसा पापाक्रांत मत प्रयत्न करो….मन को अधीन करो तो ही रसास्वादन है, मन के अधीन हो गए तो सदा विनाश ही आसन्न है।
व्यंग्य

ये मेरी प्रशंसित कहानियों से एक है। आपको ये कैसी लगी कमेंट्स जरिये मुझे बताएं। इसके प्रकाशित होने के बाद कई लोगों ने मुझसे संपर्क किया और बताया कि ये कहानी वास्तव में एक अद्भुत रचना है। मेरे अन्य ब्लॉग्स को पढऩे के लिए इस लिंक पर आए ajayv4shrivastava.blogspot.com.

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हव्य वाहन की राजनर्तकी मोहिनी कक्ष के भीतर एकांत में थी तभी राजकवि कलाधिक्य ने प्रवेश किया।  मोहिनी तुरंत खड़ी हो गई। कक्ष में सुगंधित वायु चल रही थी। मोहिनी के केश खुले हुए थे जिनमें गुंथा गजरा टूटा हुआ केशों में फंसा था। मोहिनी के पायल की झंकार समस्त कक्ष के मौन को भंग कर रही थी। मोहिनी के गुलाबी वस्त्र में  गौरवर्ण लिए विद्युत की भांति चमक रही थी। माथे पर चंदन और रक्तचंदन का तिलक, ओष्ठ सहज गुलाबी, नेत्र विशाल और मुख पर आश्चर्य। क्या बात है आर्यकुमार आप दासी के कक्ष में..मोहिनी के सम्मोहन से कलाधिक्य वशीकृत हो चुका था। स्वयं को सम्हालकर वो बोला- मोहिनी मैंने तुम्हारा नृत्य देखा, मृदंग की थाप पर तुम्हारे नुपुरों की झंकार और एक सुंदर समन्वय तुम्हारे अंगों का और उनके संचालन का। तुम्हारे रसोत्तम कंठ का जिससे तुम मेरे और स्वयं द्वारा रचित गीत गाती हो। तुम तो साक्षात कला की देवी की तरह हो…मैं तुम्हारी स्तुत्य में तुम्हारे चरणों को ससम्मान ओष्ठों से लगाकर चुंबन लेना चाहता हूं। मोहिनी के चरणों के पायल उनके मनोभावों में बने संकोच के कारण छनक उठी…..आर्यकुमार मैं दासी हूं। मुझे कला की देवी बनाकर आपने मेरे अंदर की कला को सम्मान दिया है। मैं आश्चर्य में हूं। मैं राजा की भोग्या की तरह हूं…मेरे नृत्यकौशल और अंगसंचालन को सदैव सभी द्वारा भोग की दृष्टि से देखा गया उसमें कला केवल आपको ही दृश्यमान हुई। अह्रश्वसराओं की कला देवताओं के द्वारा भोग्य हुई। एक भोग्या होकर मैं कला के रूप में स्तुत्य कैसे हो सकती हूं। आर्यकुमार आप कला के उदधि की भांति हैं मैं आपको चरण चुंबन का अधिकार कैसे दे सकती हूं? मैं आपको हृदय में स्थान देती हूं, अपितु मैं आपके प्रति कृतज्ञ हूं। आप मुझ क्षुद्र नलिका को स्वयं में स्थान देकर धन्य करें…..नलिका नहीं कला की देवी हे कला की गांगेय मैं तुम्हें क्या सम्मान दूं, तुम साक्षात सरस्वती के द्वारा सम्मानित हो। गंगा भी तो पापों का शमन करती है। पापों को स्वयं में स्थान देकर मानव को पाप मुक्त करती है। आर्यकुमार मुझे स्वयं में स्थान दीजिए ऐसा सम्मान मुझे जन्म से आज तक नहीं मिला। कलाधिक्य और मोहिनी आलिंगन बद्घ हो गए। बहुत देर तक जब कलाधिक्य कक्ष के बाहर नहीं आया तो द्वारपाल को संदेह हुआ वो अंदर गया तो एक मादक सुगंध से उन्मत्त हो गया। उसने देखा कि शैया पर स्र्वगतुल्य फूलों के ढेर पर नुपुर रखे हुए थे। पवन में गीत और कविताओं सहित नुपुरों की आवाज की सरसराहट है। वो घबरा गया। राजा हव्यवाहन को बुलाया गया। उसने ये देखा राजपुरोहित ने भी ये देखा तो वो बोले कि दो महान कला की आत्माओं का ये दिव्य मिलन है। इन्हें यूं ही रहने दो राजा को क्रोध आ गया। इसे जला दो…कई प्रयासों के बाद भी शैया जल न सकी। इसे नदी में बहा दो….शैया नदी में तैरने लगी। इसे हाथी से कुचलवा दो…हाथी शैया के पास जाकर नृत्य करने लगा और पुष्पों की माला अपने गले से निकालकर शैया पर डाल दी। शैया को पहाड़ से फेंक दो….राजपुरोहित ने समझाया कि ऐसा मत करो। राजा न माना शैया को पहाड़ से फेंका तो नीचे गिरने के बाद भी नष्ट नहीं हुई। राजा अंत में हारकर उसके पास गया और कला की वासना पर विजय की बात कही। तत्काल शैया में से तेज प्रकाश निकला और वो अंतर्धान हो गई। राजा ने अपनी सभी नृत्यांगनाओं को मुक्त कर दिया और सभी को ज्ञान दिया कि कला को भोग की आंच में मत भस्म करो…ऐसा पापाक्रांत मत प्रयत्न करो….मन को अधीन करो तो ही रसास्वादन है, मन के अधीन हो गए तो सदा विनाश ही आसन्न है।



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