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भ्रष्टाचार पर विशेष अध्ययन

Posted On: 28 Dec, 2017 हास्य व्यंग में

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लेख सूचना के बाद है। पढऩा जरूर (जाहिर सूचना- सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि सबसे पहले आप लोगों को बता दूं कि इससे पहले मेरे लिखे हुए ब्लॉग अथ गब्बर कथा (गब्बर की वापसी और जीएसटी पर ठाकुर से संवाद) में जीएसटी को गब्बर सर्विस टैक्स के निरूपित किया गया था। इसे गब्बरसिंह टैक्स के रूप में तोड़मरोड़कर राहुल गांधी द्वारा उपयोग किया गया है। मैंने इसका उपयोग पहले किया था इसलिए मैं राहुल गांधी पर कॉपीराइट एक्ट के तहत दावा ठोंकने की बात पर विचार कर रहा हूं। दावा करीब-करीब 100 हजार करोड़ का होगा। विदित हो अजय श्रीवास्तव)
भ्रष्टाचार पर मीडिया चीख रहा है, आमजन खीज रहा है, पीडि़त रो रहा है  पर हम ये क्यों मान रहे है कि भारत में भ्रष्टाचार है। मैं तो भारत की हर डिक्शनरी में देख चुका हूं हिन्दी में भ्रष्टाचार तो क्या भ्रष्ट शब्द भी नहीं मिला और अंग्रेजी में करप्शन नाम का शब्द ढूंढे नहीं मिला। यानी किसी भी शब्दकोष में ये नहीं था माने साफ मतलब है ये भारत में पाया ही नहीं जाता।
प्रोफेसर करप्ट एंड भ्रष्टाचारी के अनुसार भारत नामक देश में किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं पाया जाता। क्योंकि  भ्रष्ट होना भारतीयों की फितरत में ही नहीं है। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के सभी आरोपियों के बरी हो जाने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रहा है। वैसे तो इस देश में भ्रष्टाचार है ही नहीं पर  फिर भी  यहां समय-समय पर अपवाद स्वरूप भ्रष्टाचार के मामले उठते रहे हैं। कुछ एक मामले में किसी को सजा भी हुई है पर इस बात को प्रयोगात्मक तौर पर लेना चाहिए कि ये एक पूर्व परीक्षा है यदि भ्रष्टाचार होता है तो क्या होगा?
प्रोफेसर पोपट लाल पांजा इस बात पर विश्वास करते है कि कहीं भ्रष्टाचार हो सकता है। सेना में या सरकार में, हो सकता है जनता में भी हो! भ्रष्टाचार को लेकर पीएचडी करने वाले एक महापुरुष ने लिखा है कि -भ्रष्टाचार का पहला मामला चार अरब, बीस लाख- मोटे तौर पर चार सौ बीस अरब साल  पुराना है। जब एक बच्चे ने एक अधेड़ को नीच कहा और अधेड़ ने इसे अपने जैसे लंगोट धारियों का अपमान समझा। हुआ यह था कि अधेड़ा लंगोटाधारी डायनासोरों के खाने में भ्रष्टाचार कर रहा था। जो घास या मांस आ रहा था उसे भालू के साथ बांटकर खा रहा था। अंत में डायनासोर भूखे मर गए। आज के वैज्ञानिक इस बात से अंजान हैं। उस बच्चे का लोगों ने प्यार से पप्पू कहा जो दुनिया का सबसे पहला नाम था जो किसी जीवधारी को मिला। हालांकि पप्पू टॉफियों की अफरातफरी करता रहा था।  अधेड़ लंगोटधारी यही नहीं रुका उसने लोगों को भाषण देने शुरू कर दिए वो बोलता गया बोलता गया और उसकी आवाज से जंगलों में बैठे उस समय के विचित्र जीवजंतुओं और सरीसृपों में हड़कंप मच गया। किसी के बाल झड़ गए, कोई अपने सींग खो बैठा, किसी के तो नए-नए सींग निकलने लगे इसी बीच कुछ बंदरों की पुंछे झड़ गई। अधेड़ ने उसको अपने साथ ले लिया। बच्चे ने सोच लिया कि वो उसे नहीं छोड़ेगा चाहे कितने ही युग बीत जाएं।
खैर, ये साइंस की बात हैै। मूल पर आएं, आप लोग मुझे मुद्दे से भटकाने का प्रयास मत कीजिए, बात तो ये है कि भारत में भ्रष्टाचार नहीं है। इस बात को समझते हुए हमने भ्रष्टाचार शब्द को हटा दिया और उनसे उपजने वाले घोटालों को भूल गए। हालांकि घोटालों पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। हर घोटाला करने वाला घोटाला हो जाने के बाद तुरंत ही अगले घोटाले की तैयारी में लग जाता है, कितना समर्पित व्यक्ति है। कालेधन की बात चली तो धन की  कालक का जिक्र भी होना लाजमी है। पहले कहा गया था कि ब बालैंड में भारतीयों ने काफी कालाधन जमा कर रखा है। हमारे प्रधानजी ने कहा कि वहां से पैसा लौटेगा और सबके खाते में लाखों जमा हो जाएंगे। कालूराम कालिया ने ये सुनकर बैंक में अकाउंट बनवा लिया और सुनहरे जीवन के सपने देखने लगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ उलटा नोटबंदी हो गई और फिर जीएसटी लग गया। इस बात पर काड़ीलाल कांडी सवाल करता है कि क्या गरीबी पर भी जीएसटी लगेगा। बड़ा ही गंभीर प्रश्र है, प्रो. पोपटलाल पांजा आगे कहते हैं कि जीएसटी लगाने के लिए जरूरी है कि आपके पास कुछ हो। गरीबी में आपके पास कुछ भी नहीं होता इसलिए आप इस कर से बाहर हैं। पांजा कहते हैं कि आप तो भ्रष्टाचार और इसकी वर्तनी सहित अर्थ-अर्थागत पर चर्चा कीजिए। ज्यादा सोचते ही क्यों हो? क्योंकि आपको अक्ल नहीं है, वैसे भी प्रधानजी का कहना है कि न तो खाऊंगा न खाने दूंगा। यानी भूखेे ही रहना होगा। भूख भ्रष्टाचार को उत्तेजना प्रदान कर सकती है जिससे ये तत्व जो शायद भारत में नहीं है भविष्य में आ जाए। आश्चर्य है भ्रष्टाचार पूर्व में नहीं था अब शायद आ सकता है। पांजा कहते हैं कि ये अजब विरोधाभास है कि एक ओर स्पेक्ट्रम मामले में सभी बरी हो जाते हंै तो वहीं लालू चारा खाते पकड़े जाते हैं। बात वहीं है न खाने दूंगा। चारा ााया जा सकता है पर स्पेक्ट्रम नहीं।
वैसे खबर है कि प्रधानजी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाकर ही रहेंगे भले ही बम्बानी और दूसरे पकड़े न जाएं क्योंकि वे खाते ही नहीं खिलाते भी हैं। प्रो. भ्रष्टाचारी ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैंने भ्रष्टाचार पर कुछ और कहा तो वो मुझे भ्रष्ट साबित कर देंगे। मुझ पर वैचारिक घोटाले का आरोप लगाकर बदनाम कर देंगे यदि और दुश्मनी निकाली तो मिस भ्रष्टकुमारी के बौद्धिक शोषण का मामला लगवा देंगे।  इसलिए मैं कलम को रोक रहा हूं।

लेख सूचना के बाद है। पढऩा जरूर (जाहिर सूचना- सर्वसाधारण को सूचित किया जाता है कि सबसे पहले आप लोगों को बता दूं कि इससे पहले मेरे लिखे हुए ब्लॉग अथ गब्बर कथा (गब्बर की वापसी और जीएसटी पर ठाकुर से संवाद) में जीएसटी को गब्बर सर्विस टैक्स के निरूपित किया गया था। इसे गब्बरसिंह टैक्स के रूप में तोड़मरोड़कर राहुल गांधी द्वारा उपयोग किया गया है। मैंने इसका उपयोग पहले किया था इसलिए मैं राहुल गांधी पर कॉपीराइट एक्ट के तहत दावा ठोंकने की बात पर विचार कर रहा हूं। दावा करीब-करीब 100 हजार करोड़ का होगा। विदित हो अजय श्रीवास्तव)

भ्रष्टाचार पर मीडिया चीख रहा है, आमजन खीज रहा है, पीडि़त रो रहा है  पर हम ये क्यों मान रहे है कि भारत में भ्रष्टाचार है। मैं तो भारत की हर डिक्शनरी में देख चुका हूं हिन्दी में भ्रष्टाचार तो क्या भ्रष्ट शब्द भी नहीं मिला और अंग्रेजी में करप्शन नाम का शब्द ढूंढे नहीं मिला। यानी किसी भी शब्दकोष में ये नहीं था माने साफ मतलब है ये भारत में पाया ही नहीं जाता।

प्रोफेसर करप्ट एंड भ्रष्टाचारी के अनुसार भारत नामक देश में किसी भी तरह का भ्रष्टाचार नहीं पाया जाता। क्योंकि  भ्रष्ट होना भारतीयों की फितरत में ही नहीं है। टूजी स्पेक्ट्रम घोटाले के सभी आरोपियों के बरी हो जाने के बाद इस बात में कोई संदेह नहीं रहा है। वैसे तो इस देश में भ्रष्टाचार है ही नहीं पर  फिर भी  यहां समय-समय पर अपवाद स्वरूप भ्रष्टाचार के मामले उठते रहे हैं। कुछ एक मामले में किसी को सजा भी हुई है पर इस बात को प्रयोगात्मक तौर पर लेना चाहिए कि ये एक पूर्व परीक्षा है यदि भ्रष्टाचार होता है तो क्या होगा?

प्रोफेसर पोपट लाल पांजा इस बात पर विश्वास करते है कि कहीं भ्रष्टाचार हो सकता है। सेना में या सरकार में, हो सकता है जनता में भी हो! भ्रष्टाचार को लेकर पीएचडी करने वाले एक महापुरुष ने लिखा है कि -भ्रष्टाचार का पहला मामला चार अरब, बीस लाख- मोटे तौर पर चार सौ बीस अरब साल  पुराना है। जब एक बच्चे ने एक अधेड़ को नीच कहा और अधेड़ ने इसे अपने जैसे लंगोट धारियों का अपमान समझा। हुआ यह था कि अधेड़ा लंगोटाधारी डायनासोरों के खाने में भ्रष्टाचार कर रहा था। जो घास या मांस आ रहा था उसे भालू के साथ बांटकर खा रहा था। अंत में डायनासोर भूखे मर गए। आज के वैज्ञानिक इस बात से अंजान हैं। उस बच्चे का लोगों ने प्यार से पप्पू कहा जो दुनिया का सबसे पहला नाम था जो किसी जीवधारी को मिला। हालांकि पप्पू टॉफियों की अफरातफरी करता रहा था।  अधेड़ लंगोटधारी यही नहीं रुका उसने लोगों को भाषण देने शुरू कर दिए वो बोलता गया बोलता गया और उसकी आवाज से जंगलों में बैठे उस समय के विचित्र जीवजंतुओं और सरीसृपों में हड़कंप मच गया। किसी के बाल झड़ गए, कोई अपने सींग खो बैठा, किसी के तो नए-नए सींग निकलने लगे इसी बीच कुछ बंदरों की पुंछे झड़ गई। अधेड़ ने उसको अपने साथ ले लिया। बच्चे ने सोच लिया कि वो उसे नहीं छोड़ेगा चाहे कितने ही युग बीत जाएं।

खैर, ये साइंस की बात हैै। मूल पर आएं, आप लोग मुझे मुद्दे से भटकाने का प्रयास मत कीजिए, बात तो ये है कि भारत में भ्रष्टाचार नहीं है। इस बात को समझते हुए हमने भ्रष्टाचार शब्द को हटा दिया और उनसे उपजने वाले घोटालों को भूल गए। हालांकि घोटालों पर बहुत कुछ कहा जा सकता है। हर घोटाला करने वाला घोटाला हो जाने के बाद तुरंत ही अगले घोटाले की तैयारी में लग जाता है, कितना समर्पित व्यक्ति है। कालेधन की बात चली तो धन की  कालक का जिक्र भी होना लाजमी है। पहले कहा गया था कि ब बालैंड में भारतीयों ने काफी कालाधन जमा कर रखा है। हमारे प्रधानजी ने कहा कि वहां से पैसा लौटेगा और सबके खाते में लाखों जमा हो जाएंगे। कालूराम कालिया ने ये सुनकर बैंक में अकाउंट बनवा लिया और सुनहरे जीवन के सपने देखने लगा पर ऐसा कुछ नहीं हुआ उलटा नोटबंदी हो गई और फिर जीएसटी लग गया। इस बात पर काड़ीलाल कांडी सवाल करता है कि क्या गरीबी पर भी जीएसटी लगेगा। बड़ा ही गंभीर प्रश्र है, प्रो. पोपटलाल पांजा आगे कहते हैं कि जीएसटी लगाने के लिए जरूरी है कि आपके पास कुछ हो। गरीबी में आपके पास कुछ भी नहीं होता इसलिए आप इस कर से बाहर हैं। पांजा कहते हैं कि आप तो भ्रष्टाचार और इसकी वर्तनी सहित अर्थ-अर्थागत पर चर्चा कीजिए। ज्यादा सोचते ही क्यों हो? क्योंकि आपको अक्ल नहीं है, वैसे भी प्रधानजी का कहना है कि न तो खाऊंगा न खाने दूंगा। यानी भूखेे ही रहना होगा। भूख भ्रष्टाचार को उत्तेजना प्रदान कर सकती है जिससे ये तत्व जो शायद भारत में नहीं है भविष्य में आ जाए। आश्चर्य है भ्रष्टाचार पूर्व में नहीं था अब शायद आ सकता है। पांजा कहते हैं कि ये अजब विरोधाभास है कि एक ओर स्पेक्ट्रम मामले में सभी बरी हो जाते हंै तो वहीं लालू चारा खाते पकड़े जाते हैं। बात वहीं है न खाने दूंगा। चारा ााया जा सकता है पर स्पेक्ट्रम नहीं।

वैसे खबर है कि प्रधानजी भ्रष्टाचार पर लगाम लगाकर ही रहेंगे भले ही बम्बानी और दूसरे पकड़े न जाएं क्योंकि वे खाते ही नहीं खिलाते भी हैं। प्रो. भ्रष्टाचारी ने मुझे धमकी दी है कि अगर मैंने भ्रष्टाचार पर कुछ और कहा तो वो मुझे भ्रष्ट साबित कर देंगे। मुझ पर वैचारिक घोटाले का आरोप लगाकर बदनाम कर देंगे यदि और दुश्मनी निकाली तो मिस भ्रष्टकुमारी के बौद्धिक शोषण का मामला लगवा देंगे।  इसलिए मैं कलम को रोक रहा हूं।



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