AjayShrivastava's blogs

Just another Jagranjunction Blogs weblog

44 Posts

9 comments

Reader Blogs are not moderated, Jagran is not responsible for the views, opinions and content posted by the readers.
blogid : 25810 postid : 1378669

मेरे साथ ही क्यों?

Posted On: 7 Jan, 2018 Hindi Sahitya में

  • SocialTwist Tell-a-Friend

सुबह होते ही पादरी चर्चा जाते। इसके बाद वो बस्ती में जाते और लोगों को ईसा मसीह की शिक्षाएं देते। इन शिक्षाओं से प्रभावित होकर कुछ दलित किस्म के लोग ईसाई बन गए थे। पादरी का नाम रामदास कैरन था। हालांकि उनको स्थानीय भाषा नहीं के बराबर ही आती थी। वो मिली-जुली भाषा का इस्तेमाल करते थे। फिर भी ये उनकी सफलता ही थी कि वो लोगों का उद्धार कर रहे थे। बड़े लोग उनके काम से खुश थे। कुछ लोगों ने पादरी का विरोध किया पर ये बरसाती मेंढक चुनाव के समय बोलते थे बाकी समय या तो यहां-वहां अपनी राजनीति चमकाते या हर तरह का मजा लूटते।
दलितों ने पादरी को बताया था कि ईसाई बनने के बाद मसीहा और यीशु के पुत्र यशवंत की उन पर दया दृष्टि हुई है। अब बहुत से लोग उनको उनके जाति के नाम से नहीं बुलाते। कुछ लोगों ने कहा था कि उनके दूर के रिश्तेदार भी ईसाई धर्म में दीक्षित होना चाहते हैं। सभी अपने पापों का उद्धार चाहते हैं क्योंकि अगाड़ी जात के लोग कहा करते थे कि नीची जात में पैदा होना पाप है और उनको बराबर में बिठाना पाप है। मंदिर में तो वो घुस नहीं पाते थे पर चर्च में वो घुस जाते हैं। पादरी कच्ची-पक्की भाषा में कहते- यशवंत तुम्हारे उद्धार के लिए ही आई है। उसी के लिए वो क्रूस पर चढ़ी। सभी लोग हाथ जोड़कर उनकी बातें सुनते। प्रार्थना करते। वो विचित्र आवाजों में गीत गाते और कुछ शरारती बच्चे उनका अनुकरण करते और उनके न होने पर उनका मजाक उड़ाते। वो उनकी सुनाई कहानियों का माखौल बनाते क्योंकि वो भाषा सही नहीं बोल पाते थे। हालांकि पादरी कैरन को ये बात मालूम नहीं थी।
एक दिन कैरन को पता चला कि बड़े साहब आए हैं और इस बार उनको बड़ा ओहदा मिलेगा। जिसकी राह वो सालों से देख रहे थे। कट्टर अगाड़ी जाति के लोगों के खतरों के बीच वो आखिर काम तो कर ही रहे थे। उनके पहले के लोग तो भाग ही गए थे। लोग उनको कहते ये हमारे धर्म को खत्म करना चाहता है। ये विदेशियों का एजेंट है। कुछ लोग कहते-पीट डालो इसे। पादरी को अपना दोस्त रॉबर्ट याद आ जाता जो शहर में पहले तो प्रीस्ट बना अब वो प्रधान प्रीस्ट है वो साइकल पर आया था और किराये के मकान में रहता था अब उसके पास कार है और वो स्वयं के बड़े मकान में रहता है। अब शायद उनके भी दिन बदलेंगे, अच्छे दिन आएंगे।
बड़े साहब आए। पादरी उनको बस्ती की ओर लेकर जाने लगे। वो जा ही रहे थे कि एक जगह से उद्धार के गीत गाने की आवाज आई। बड़े साहब और पादरी ने वहां झांककर देखा कुछ बच्चे झूमझूम कर गीत गा रहे थे। ये मेरी शिक्षा का परिणाम है, पादरी बोले। हां दिख रहा है तुम्हारा काम। तुमको प्रशंसा और बहुत कुछ मिलेगा। बड़े साहब खुश होकर बोले। तभी एक बच्चा बोला- एई, तुम सब उद्धार चाहती। सभी बच्चे एक स्वर में बोले-चाहती। हम तुमको कहानी सुनाती। सुनाई-सुनाई। तो सुनी…बच्चा पादरी की तरह बोलकर उनकी कहानियों का मजाक उड़ाने लगा। ये सब क्या हे? बड़े साहब को गुस्सा आ गया। ये ही तुम्हारी शिक्षा है। नहीं साहब वो तो..। अब बच्चा बोला- तुम हमारे साथ गीत गाई। हां गाई- बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े। अच्छा तो ये हो रहा है यहां हैं…नहीं साहब..हमारा धर्म का मजाक हो रही है- बड़े साहब को भी स्थानीय भाषा यानी हिंदी बोलने में दिक्कत हो रही थी। साहब वो तो बच्चे हैं यहां आइये जहां काम हुआ है। बड़े साहब आगे जाने लगे थे कि उन्होंने देखा नारंगी रंग का कुर्ता-पैजामा पहने एक आदमी कुछ दूर दीवार से टिककर अपनी गुप्ती से नेपथ्य में निशाना लगा रहा था। बड़े साहब घबरा गए और बोले- बाद में देख लेंगे। वापस चलो। पर साहब काम नहीं देखोगे तो ओहदा कैसे दोगे? ओहदा देख लिया तुम्हारी काम जहा (यहां)। वापस चलो। हम तुम्हारे ओहदे की कोई सिफारिश नहीं करेगी। बड़े साहब वापस पलट कर चले गए। कैरन सोचने लगे- ये सब आज ही और मेरे ही साथ क्यों होना था?
सुबह होते ही पादरी चर्चा जाते। इसके बाद वो बस्ती में जाते और लोगों को ईसा मसीह की शिक्षाएं देते। इन शिक्षाओं से प्रभावित होकर कुछ दलित किस्म के लोग ईसाई बन गए थे। पादरी का नाम रामदास कैरन था। हालांकि उनको स्थानीय भाषा नहीं के बराबर ही आती थी। वो मिली-जुली भाषा का इस्तेमाल करते थे। फिर भी ये उनकी सफलता ही थी कि वो लोगों का उद्धार कर रहे थे। बड़े लोग उनके काम से खुश थे। कुछ लोगों ने पादरी का विरोध किया पर ये बरसाती मेंढक चुनाव के समय बोलते थे बाकी समय या तो यहां-वहां अपनी राजनीति चमकाते या हर तरह का मजा लूटते।
दलितों ने पादरी को बताया था कि ईसाई बनने के बाद मसीहा और यीशु के पुत्र यशवंत की उन पर दया दृष्टि हुई है। अब बहुत से लोग उनको उनके जाति के नाम से नहीं बुलाते। कुछ लोगों ने कहा था कि उनके दूर के रिश्तेदार भी ईसाई धर्म में दीक्षित होना चाहते हैं। सभी अपने पापों का उद्धार चाहते हैं क्योंकि अगाड़ी जात के लोग कहा करते थे कि नीची जात में पैदा होना पाप है और उनको बराबर में बिठाना पाप है। मंदिर में तो वो घुस नहीं पाते थे पर चर्च में वो घुस जाते हैं। पादरी कच्ची-पक्की भाषा में कहते- यशवंत तुम्हारे उद्धार के लिए ही आई है। उसी के लिए वो क्रूस पर चढ़ी। सभी लोग हाथ जोड़कर उनकी बातें सुनते। प्रार्थना करते। वो विचित्र आवाजों में गीत गाते और कुछ शरारती बच्चे उनका अनुकरण करते और उनके न होने पर उनका मजाक उड़ाते। वो उनकी सुनाई कहानियों का माखौल बनाते क्योंकि वो भाषा सही नहीं बोल पाते थे। हालांकि पादरी कैरन को ये बात मालूम नहीं थी।
एक दिन कैरन को पता चला कि बड़े साहब आए हैं और इस बार उनको बड़ा ओहदा मिलेगा। जिसकी राह वो सालों से देख रहे थे। कट्टर अगाड़ी जाति के लोगों के खतरों के बीच वो आखिर काम तो कर ही रहे थे। उनके पहले के लोग तो भाग ही गए थे। लोग उनको कहते ये हमारे धर्म को खत्म करना चाहता है। ये विदेशियों का एजेंट है। कुछ लोग कहते-पीट डालो इसे। पादरी को अपना दोस्त रॉबर्ट याद आ जाता जो शहर में पहले तो प्रीस्ट बना अब वो प्रधान प्रीस्ट है वो साइकल पर आया था और किराये के मकान में रहता था अब उसके पास कार है और वो स्वयं के बड़े मकान में रहता है। अब शायद उनके भी दिन बदलेंगे, अच्छे दिन आएंगे।
बड़े साहब आए। पादरी उनको बस्ती की ओर लेकर जाने लगे। वो जा ही रहे थे कि एक जगह से उद्धार के गीत गाने की आवाज आई। बड़े साहब और पादरी ने वहां झांककर देखा कुछ बच्चे झूमझूम कर गीत गा रहे थे। ये मेरी शिक्षा का परिणाम है, पादरी बोले। हां दिख रहा है तुम्हारा काम। तुमको प्रशंसा और बहुत कुछ मिलेगा। बड़े साहब खुश होकर बोले। तभी एक बच्चा बोला- एई, तुम सब उद्धार चाहती। सभी बच्चे एक स्वर में बोले-चाहती। हम तुमको कहानी सुनाती। सुनाई-सुनाई। तो सुनी…बच्चा पादरी की तरह बोलकर उनकी कहानियों का मजाक उड़ाने लगा। ये सब क्या हे? बड़े साहब को गुस्सा आ गया। ये ही तुम्हारी शिक्षा है। नहीं साहब वो तो..। अब बच्चा बोला- तुम हमारे साथ गीत गाई। हां गाई- बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े। अच्छा तो ये हो रहा है यहां हैं…नहीं साहब..हमारा धर्म का मजाक हो रही है- बड़े साहब को भी स्थानीय भाषा यानी हिंदी बोलने में दिक्कत हो रही थी। साहब वो तो बच्चे हैं यहां आइये जहां काम हुआ है। बड़े साहब आगे जाने लगे थे कि उन्होंने देखा नारंगी रंग का कुर्ता-पैजामा पहने एक आदमी कुछ दूर दीवार से टिककर अपनी गुप्ती से नेपथ्य में निशाना लगा रहा था। बड़े साहब घबरा गए और बोले- बाद में देख लेंगे। वापस चलो। पर साहब काम नहीं देखोगे तो ओहदा कैसे दोगे? ओहदा देख लिया तुम्हारी काम जहा (यहां)। वापस चलो। हम तुम्हारे ओहदे की कोई सिफारिश नहीं करेगी। बड़े साहब वापस पलट कर चले गए। कैरन सोचने लगे- ये सब आज ही और मेरे ही साथ क्यों होना था?

सुबह होते ही पादरी चर्चा जाते। इसके बाद वो बस्ती में जाते और लोगों को ईसा मसीह की शिक्षाएं देते। इन शिक्षाओं से प्रभावित होकर कुछ दलित किस्म के लोग ईसाई बन गए थे। पादरी का नाम रामदास कैरन था। हालांकि उनको स्थानीय भाषा नहीं के बराबर ही आती थी। वो मिली-जुली भाषा का इस्तेमाल करते थे। फिर भी ये उनकी सफलता ही थी कि वो लोगों का उद्धार कर रहे थे। बड़े लोग उनके काम से खुश थे। कुछ लोगों ने पादरी का विरोध किया पर ये बरसाती मेंढक चुनाव के समय बोलते थे बाकी समय या तो यहां-वहां अपनी राजनीति चमकाते या हर तरह का मजा लूटते।

दलितों ने पादरी को बताया था कि ईसाई बनने के बाद मसीहा और यीशु के पुत्र यशवंत की उन पर दया दृष्टि हुई है। अब बहुत से लोग उनको उनके जाति के नाम से नहीं बुलाते। कुछ लोगों ने कहा था कि उनके दूर के रिश्तेदार भी ईसाई धर्म में दीक्षित होना चाहते हैं। सभी अपने पापों का उद्धार चाहते हैं क्योंकि अगाड़ी जात के लोग कहा करते थे कि नीची जात में पैदा होना पाप है और उनको बराबर में बिठाना पाप है। मंदिर में तो वो घुस नहीं पाते थे पर चर्च में वो घुस जाते हैं। पादरी कच्ची-पक्की भाषा में कहते- यशवंत तुम्हारे उद्धार के लिए ही आई है। उसी के लिए वो क्रूस पर चढ़ी। सभी लोग हाथ जोड़कर उनकी बातें सुनते। प्रार्थना करते। वो विचित्र आवाजों में गीत गाते और कुछ शरारती बच्चे उनका अनुकरण करते और उनके न होने पर उनका मजाक उड़ाते। वो उनकी सुनाई कहानियों का माखौल बनाते क्योंकि वो भाषा सही नहीं बोल पाते थे। हालांकि पादरी कैरन को ये बात मालूम नहीं थी।

एक दिन कैरन को पता चला कि बड़े साहब आए हैं और इस बार उनको बड़ा ओहदा मिलेगा। जिसकी राह वो सालों से देख रहे थे। कट्टर अगाड़ी जाति के लोगों के खतरों के बीच वो आखिर काम तो कर ही रहे थे। उनके पहले के लोग तो भाग ही गए थे। लोग उनको कहते ये हमारे धर्म को खत्म करना चाहता है। ये विदेशियों का एजेंट है। कुछ लोग कहते-पीट डालो इसे। पादरी को अपना दोस्त रॉबर्ट याद आ जाता जो शहर में पहले तो प्रीस्ट बना अब वो प्रधान प्रीस्ट है वो साइकल पर आया था और किराये के मकान में रहता था अब उसके पास कार है और वो स्वयं के बड़े मकान में रहता है। अब शायद उनके भी दिन बदलेंगे, अच्छे दिन आएंगे।

बड़े साहब आए। पादरी उनको बस्ती की ओर लेकर जाने लगे। वो जा ही रहे थे कि एक जगह से उद्धार के गीत गाने की आवाज आई। बड़े साहब और पादरी ने वहां झांककर देखा कुछ बच्चे झूमझूम कर गीत गा रहे थे। ये मेरी शिक्षा का परिणाम है, पादरी बोले। हां दिख रहा है तुम्हारा काम। तुमको प्रशंसा और बहुत कुछ मिलेगा। बड़े साहब खुश होकर बोले। तभी एक बच्चा बोला- एई, तुम सब उद्धार चाहती। सभी बच्चे एक स्वर में बोले-चाहती। हम तुमको कहानी सुनाती। सुनाई-सुनाई। तो सुनी…बच्चा पादरी की तरह बोलकर उनकी कहानियों का मजाक उड़ाने लगा। ये सब क्या हे? बड़े साहब को गुस्सा आ गया। ये ही तुम्हारी शिक्षा है। नहीं साहब वो तो..। अब बच्चा बोला- तुम हमारे साथ गीत गाई। हां गाई- बच्चे खिलखिलाकर हंस पड़े। अच्छा तो ये हो रहा है यहां हैं…नहीं साहब..हमारा धर्म का मजाक हो रही है- बड़े साहब को भी स्थानीय भाषा यानी हिंदी बोलने में दिक्कत हो रही थी। साहब वो तो बच्चे हैं यहां आइये जहां काम हुआ है। बड़े साहब आगे जाने लगे थे कि उन्होंने देखा नारंगी रंग का कुर्ता-पैजामा पहने एक आदमी कुछ दूर दीवार से टिककर अपनी गुप्ती से नेपथ्य में निशाना लगा रहा था। बड़े साहब घबरा गए और बोले- बाद में देख लेंगे। वापस चलो। पर साहब काम नहीं देखोगे तो ओहदा कैसे दोगे? ओहदा देख लिया तुम्हारी काम जहा (यहां)। वापस चलो। हम तुम्हारे ओहदे की कोई सिफारिश नहीं करेगी। बड़े साहब वापस पलट कर चले गए। कैरन सोचने लगे- ये सब आज ही और मेरे ही साथ क्यों होना था?



Tags:

Rate this Article:

1 Star2 Stars3 Stars4 Stars5 Stars (1 votes, average: 5.00 out of 5)
Loading ... Loading ...

1 प्रतिक्रिया

  • SocialTwist Tell-a-Friend

Post a Comment

CAPTCHA Image
*

Reset

नवीनतम प्रतिक्रियाएंLatest Comments

Shobha के द्वारा
January 8, 2018

श्री अजय जी अनूठी दिलचस्प कहानी


topic of the week



latest from jagran